गलती की माफ़ी कैसे माँगे? सॉरी कैसे बोले?

Galti ki Maafi kaise maange, sorry kaise bole?

 ज़रूरी नहीं हर बार गलती की सज़ा ही दी जाए कभी- कभी माफ़ी मांगने पर सामने वाले को माफ़ कर के भी देखना चाहिए, इससे अपना ही दिल हल्का होता है और सच कहूँ तो जिसको दिल से अपने करे का एहसास होता है वो सुधरने की कोशिश जरुर करता है. दोस्तों कहतें हैं इंसान गलती कर के ही सीखता है. मैंने भी सीखा. लेकिन इस बार सिखाने वाले में मेरी गलतियों के अलावा मेरे अपने भी शामिल थे, जो अनजाने में मुझे सिखा गये.

स्कूल के दिनों से ही मुझे चुप- चाप रहना बेहद पसंद था, फ़िज़ूल में बात करना मुझे ज़रा भी नहीं सुहाता था इसलिए स्कूल के समय में मेरे दोस्त भी कुछ गिने- चुने थे, कह सकते है सेमी-सर्किल था हमारा. स्कूल टाइम में जब भी कोई मुझसे नाराज़ होता या कोई मेरी बात का बुरा मानता तो मैं उससे बात करना बंद कर देती और फ़ौरन अपनी पक्की सहेली के पास जा कर, उसको अपने शब्दों में पूरा सीन समझा कर उससे पूछा करती की तू ही बता यहाँ मैं गलत हूँ क्या? और साथ ही ये भी कहती थी की देख मैं तुझ पर भरोसा करती हूँ, तू मुझे जानती है और तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी है इसलिए मुझे यकीन है की तू हमेशा सही राह दिखाएगी मुझे. अगर तू कहती है की मैं गलत हूँ तो मैं माफ़ी मांगने के लिए तैयार हूँ. पर हर बार उसका जवाब होता था की तूने सही किया रिया तू बिलकुल भी गलत नहीं है, और ये सुन कर मैं खुश हो जाती थी. दोस्तों मैं भले कम बोलती थी लेकिन जो भी मन में होता था वो मुंह पर बोलती थी.

यही कारण था की कभी मैंने अपनी गलतियों पर ध्यान नहीं दिया, और जो ध्यान ही नहीं दिया तो सुधारना तो बहुत दूर की बात है. मैं ऐसे ही बड़ी हुई, फिर कॉलेज का टाइम आया, दोस्तों से बात अब बहुत कम हो चुकी थी. मेरी दोस्त बातूनी थी दोनों को बहुत शौक था बात करने का, अपने बारे में सुनाने का, क्या हुआ कैसे हुआ और क्यों हुआ ये सब बतलाने का. इसलिए वो कॉल कर लिया करती थी, मैं भी फिर बात कर लेती थी लेकिन उनकी हमेशा ये शिकायत रहती थी की मैं अब उनसे बात नहीं करती हूँ, उन्हें समय नहीं देती हूँ. खैर वो भी अपनी जगह सही थीं. कॉलेज में जब एक ख़ास दोस्त से धोखा मिला तब मैंने फिर अपनी पुरानी दोस्तों से बात करना शुरू कर दिया, जैसे ही लंच टाइम होता मैं उनको कॉल लगा देती, बात क्या करनी है ये पता नहीं होता था लेकिन तब भी वो कहती थी की तू अकेली हो तो कॉल कर लिया कर हम हैं, बात क्या करनी हैं वो हम देख लेंगे.

पर फिर कुछ हालत ऐसे बने जिसकी वजह से एक दोस्त नाराज़ हो गयी, फिर हर बार की तरह मैंने वही किया, सामने से उससे माफ़ी मांगने की बजाये अपनी दूसरी दोस्त को फ़ोन कर के सब कुछ बताया और फिर पूछा की बता यहाँ कौन गलत है, उसका जवाब था की तू तो जानती है न वो केसी है चिंता मत कर मान जाएगी, तेरी गलती नहीं है. फिर कुछ समय बाद अपर्णा मेरी उस दोस्त से भी नाराज़ हो गयी जो मुझे कह रही थी की तेरी गलती नहीं है. जैसे तैसे फिर हम दोनों ने उसे मनाया, कुछ समय बाद ऐसा हुआ की शकुन नाराज़ हो गयी, और मैंने अपनी वही आदत दोहराई, वही हुआ, मैं गलत नहीं थी और न अपर्णा फिर भी हम दोनों ब्लाक हो गये थे. ऐसा हमारा चलता रहता था माफ़ी कभी कोई नहीं मांगता था, और सब आखिर में मान जाते थे.

2019 मेरी ज़िन्दगी में ऐसा साल बन कर आया जहाँ मेरे साथ मेरी कोई पक्की दोस्त नहीं थी. उनकी न मौजूदगी उस समय मुझे काफी कुछ सिखा चुकी थी और उसी में से एक सीख है गलती और माफ़ी की, जो मैं आज आपके साथ साझा करने जा रही हूँ. आशा करती हूँ की आपको यह स्टोरी पसंद आएगी और ज़िन्दगी के किसी न किसी मुकाम पर यह आपको मदद कर पायेगी.

2019 में मैंने पहली तिमाही में एक किताब पढ़ी थी जिसका नाम था – The secret To Positivity, ये किताब पढने का मेरा मुख्या कारण था की मेरी पक्की सहेलियां मुझे कहा करती थी की तू बहुत नेगेटिव है, हर बात पर न कर देती है, कोशिश भी कर के नहीं देखती की तू ये काम कर सकती है या नहीं. बहुत ढूंढने के बाद मुझे ऑनलाइन ये किताब पसंद आई थी, इस किताब ने मेरी काफी मदद की पॉजिटिव नजरिया अपनाने में.

साल की दूसरी तिमाही में मैंने खुद को एक और किताब गिफ्ट की, उसका नाम था – How to Win and Influence People by Dale Carnegie. इस किताब को पढने की उत्सुकता मुझे इसलिए थी क्योंकि मेट्रो में काफी लोगो को मैंने ये किताब पढ़ते थे देखा था, और डेल कार्नेगी से सम्बंधित काफी सारी विडोज़ भी YouTube पर मैंने देखी थी. असल में मैं जानना चाहती थी की क्या है इस किताब में जो लोग इसे इतना पसंद करते हैं . दोस्तों असल में इस किताब से मैंने काफी कुछ सीखा है जो मैं आपसे हर इतवार साझा करने की कोशिश करुँगी. फ़िलहाल के लिए इसी से मिली सीख पर बात करते हैं.

इस किताब में एक पाठ है जिसमें कहा गया है की आप कभी भी सामने वाले को ये मत बोलो की वो गलत है, क्योंकि इससे वो अपना बचाव करने में जुट जाता है और आपकी बात मानने में कतई भी रुचि नहीं रखता है. साथ ही वो अपने आप को सही ठहराने के प्रयास करने लग जाता है. यही कारण है की बहस का कोई फायदा नहीं रह जाता है, अच्छे ढंग से बात करनी चाहिए. दूसरा ये पाठ है की अगर कोई आपसे गुस्सा है, रूठा या नाराज़ है तो आप उससे बिना देर किये सच्चे मन से माफ़ी मांगलो, इससे ये होता है की सामने वाले को एहसास होता है की उनका साथ आपके लिए बहुत जरूरी है और आप उन्हें झगड कर बिलकुल भी खोना नहीं चाहते हैं. दोस्तों पाठ तो हर किताब सिखाती है मगर ज़िन्दगी में कब कैसे प्रतिक्रया देनी है ये इस किताब की मदद से मैं जान पायी.

Galti ki Maafi kaise maange, sorry kaise bole?

माफ़ी मांग कर खुद को भी अच्छा लगता है और सामने वाला भी सुखी हो जाता है, मन हल्का हो जाता है. जीवन में अगर कभी भी आप मेरी तरह न जान पायो की क्या आपकी गलती है या नहीं, तो पहले ये सोचना की वो रिश्ता आपके लिए क्या मायने रखता है और फिर क्या आप चाहते हो की सामने वाला खुश रहे हमेशा? तो बस बिना हिचक के माफ़ी मांग लेना. हाँ माना हर बार माफ़ी आसानी से मिलना मुश्किल है लेकिन ये भी सच है की सच्चे और अच्छे रिश्ते सदा के लिए गंवाने से बेहतर है झुक कर सामने वाले से माफ़ी मांग लेना.

अब मैं ऐसा कैसे कह सकती हूँ जब मैंने जीवन भर कभी अपनी गलती न जानी और न मानी? तो दोस्तों हुआ ये की वो पाठ पढ़ते समय मुझे एक घटना याद आई. साल 2015 की बात है जब मेरे दादा जी(बाबा) की याददाश्त बहुत अधिक कमज़ोर हो गयी थी, वो छोटी- छोटी बात पर घबराने लगते थे, चिढ-चिढ़े भी हो गया थे. वो सब रिश्ते भूल चुके थे. एक रात ऐसे ही दादी उनसे खाने के बारे में पूछ रही थी इस पर बाबा को बहुत गुस्सा आ गया और उन्होंने दादी को धक्का दे दिया, दादी बिस्तर के कोने पर बैठी हुई थी तो वो गिर गयी थी. उन्हें बहुत दर्द हो रहा था, वो रो रही थी. दादी की आवाज़ सुन कर जब सब कमरे में गये तो डैडी ने पहले तो दादी को उठाया और फिर बाबा को बहुत गुस्सा किया और गुस्से-गुस्से में उन्होंने बाबा को एहसास दिलवाया की दादी उनका कितना ख्याल रखती हैं, अगर वो नहीं होंगी तो आपका ख्याल कौन रखेगा? सही समय पर दवाई कौन देगा? इतनी सेवा कौन करेगा? हमसे तो नहीं हो पायेगा. ये सब सुनाने के बाद डैडी कमरे से बाहर आ गये, बाबा को कमरे में अकेला छोड़ कर और दादी से बोला की आप आज यहाँ ही सो जाना. अन्दर मत जाना.

कुछ समय बाद बाबा खुद कमरे से बाहर आये और दादी से हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगने लगे, बाबा ने पहले कभी दादी पर हाथ तक नहीं उठाया था, सब उनसे नाराज़ थे लेकिन सब उनकी हालत जानते थे. बाबा वॉकर से चलते थे लेकिन उस टाइम उन्होंने अपनी फ़िक्र न करते हुए बाहर आ कर खुद दादी से सच्चे दिल से माफ़ी मांगी थी. और उस दिन सबने उन्हें माफ़ किया, उस टाइम सबका गुस्सा शांत हो गया था, और वो समय ऐसा था जब बाबा-दादी बहुत दिनों बाद साथ में खुश दिखाई दे रहे थे. उस रात जब तक दादी नहीं सोयी, बाबा उनके पास बेठे रहे और माफ़ी मांगते रहे, उन्होंने दादी को मानाने के लिए गाना भी गाया था.

बस दोस्तों उस पाठ को पढ़कर इस किस्से की याद जबसे ताज़ा है तब से मुझे अपनी किसी भी गलती पर माफ़ी मांगने पर संकोच नहीं होता. मुझे अब रिश्तो की समझ आ गयी है. चाहे गलती हो न हो अगर सामने वाला किसी कारण से आपसे नाराज़ है तो उसके पीछे कोई वजह जरुर होगी, उसका दिल दुखा जरुर होगा, क्योंकि किसी को अपनों से खफा होने की आदत नहीं होती.

चलते चलते और एक बात, मैं ये बिलकुल नहीं कहती की मेरे दोस्तों ने या फिर आप जिससे अपनी गलतियों के बारे में मेरे जैसे ही चर्चा करते हो, उसने आपको गलत सलाह दी. असल में फरक शब्दों का होता है. आप अपनों को जो कहानी बताते है वो एक तरफ की होती और दूसरा ये की आप कहानी ऐसे बताते हैं जिसमें आप खुद को गलत मानते ही नहीं इसलिए आपके शब्दों का चुनाव भी कुछ इस प्रकार होता है जिससे की सामने वाले को लगे की गलती आपकी हो ही नहीं सकती, गलती सामने वाले की है. शब्द ज़िन्दगी में बहुत एहम भूमिका निभाते हैं और इस पर चर्चा हम जरुर करेंगे. फ़िलहाल के लिए बस इतना कहना चाहूंगी की अगर सच्चे रिश्तों की एह्मियात का अंदाज़ा है तो माफ़ी मांगने में कभी संकोच न करें. धन्यवाद.

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4 thoughts on “गलती की माफ़ी कैसे माँगे? सॉरी कैसे बोले?”

  1. जबरदस्त सोच है ओर चिजो को जोड़ा बहुत ही अच्छे से तरीके से किया गया है।

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