अपनी पहचान बनाना क्यों ज़रूरी है?

Apni pehchan banana kyon zaruri hai

अपनी अलग पहचान कैसे बनाये, पहचान बनाने के लिए क्या ज़रूरी है इसका जवाब आपको आसानी से मिल जायेगा लेकिन एक सवाल जिसका जवाब आसानी से मिल पाना थोडा मुश्किल है वो ये की आखिर पहचान बनाना क्यों ज़रूरी है? एक इन्त्रोवर्ट होने के नाते इस सवाल का जवाब जानना/ खोजना बहुत मायने रखता है, इसलिए आज का ब्लॉग “अपनी पहचान बनाना क्यों ज़रूरी है” के जवाब को समर्पित है.

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बचपन से एक सवाल जो हर कोई पूछ ही लेता है- “बेटा, बड़े हो कर क्या बनना चाहते हो?” अब इसका जवाब हमारे समय में वो होता था जो हम आसपास की दुनिया में देख लेते थे. उस समय की छोटी सी दुनिया के जवाब टीचर, डॉक्टर, बैटमैन, स्पाइडरमैन, सचिन तेंदुलकर, धोनी आदि हुआ करते थे. फिर इस बीच एक विज्ञापन आया क्लासमेट का जिसने कहा “अनोखेपन का जश्न मनाओ क्योंकि आप अपनी तरह के एक ही हो”. ( Celebrate uniqueness because you’re one of a kind.)

ये विज्ञापन इतने सरल शब्दों में था की इससे खुद को आसानी से जोड़ कर देखा जा सकता था क्योंकि कही न कही हम भी उस टाइम भेड़ चाल में ही जवाब दिया करते थे. ये विज्ञापन तो बड़े होते हुए भी याद रहा लेकिन इसका मतलब शयद हम भूल चुके थे, ये विज्ञापन प्रेरित करता था अपनी पहचान बनाने को.

अब अपनी पहचान बनाना क्यों ज़रूरी है इसके जवाब पर ध्यान देते हैं.

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क्या आपसे कभी किसी ने कहा है की आप मेरी प्रेरणा स्रोत हो? अगर कहा है तो आप जानते होंगे की कितनी ख़ुशी होती है जब आप कोई अच्छा काम करते हो और लोग आपको फॉलो करते- करते अच्छाई की राह पर चलने लगते हैं.

अच्छा लगता है न जब आप किसी से बहुत साल बाद मिलें और वो तब भी आपको पह्चानले. बीते दिनों एक रील @words_made_quote की देखी, उसके बोल कुछ इस प्रकार हैं-

उसकी गली में मुझको जाना नहीं , हाल कैसा है ये भी बताना नहीं . 
बड़ी हसरत है आलम उस दिन की ,
वो कहेमैं हूँ
मैं कहूँजी पहचाना नहीं

ये लाइन अपने किसी एक्स को बोलनी हो या फिर किसी ऐसे को जिसे आप पसंद नहीं करते तो अच्छी है बोलने में. लेखक ने लिखी सबके दिल की बात बहुत खूबसूरती से है, ये सोचते- सोचते एक ख्याल आया- कैसा हो अगर यही लाइन हमारा कोई ख़ास हमको बोले, जिसे दिल से पसंद करते हो या जिससे मिलने की चाह बहुत साल बाद भी बरक़रार हो? अच्छा नहीं लगेगा न? कुछ लोगों का मासूम दिल सिर्फ इसी छोटी सी बात से टूट सकता है.

इंसान के लिए उसकी पहचान बहुत अहम् होती है और होनी भी चाहिए.

मैंने डेल कार्नेगी की एक किताब में पढ़ा था लोगों को अपना नाम बहुत पसंद होता है. उनका नाम उनकी पहचान होती है, एक फक्र की बात होती है. अगर आपको किसी से ऐसी बात करनी है जिसके लिए आपको उनकी अटेंशन की जरूरत है तो आप उनको उनके नाम से बुलाओ और वो आपकी बात पर गौर करने लग जायेंगे. (ये बात मैंने भी कई बार नोटिस की है कई लोगों के साथ, आप भी आज़मा कर देखिएगा.)

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ज़िन्दगी सिर्फ एक सफ़र है जन्म से मरण तक का, उतने में आप सब कुछ नहीं कर सकते लेकिन अपना नाम और पहचान बना सकते हैं- लोगों की मदद करके ख़ुशी पा सकते हैं, अपनों को आप गर्वित महसूस करवा सकते हैं, हर लम्फें को जी कर दुनिया के सबसे खुशहाल इंसान बन सकते हैं. वैसे भी जब मन से मन का काम करने जाओ तो समय और ज़िन्दगी दोनों बड़ी छोटी लगने लगती है.

आप लोगों का अच्छा करोगे, लोगों की मदद करोगे तो लोग आपको याद करेंगे न ही सिर्फ ज़रूरत के समय में बल्कि अपनी खुशियों में भी वो आपको शामिल करेंगे. आप कुछ अलग कर के लोगों को चौंका दोगे या फिर उन्हें झटका दोगे तब भी वो आपको याद करेंगे, और इन दोनों ही केस में आपकी पहचान बनेगी. फैसला आपको करना है की आपको अपनी पहचान बनानी है या नहीं और अगर बनानी है तो कैसी बनानी है अच्छी या बुरी.

ज़िन्दगी के सफ़र में जब करियर का मोड़ आएगा तो उस समय आपका नाम कितनी ऊपर जायेगा ये आप पर निर्भर करता है. छोटी सी ज़िन्दगी में आप किस के लिए क्या करते हो, कितना करते हो, किन कठिनाइयों में करते हो ये सब मायने रखता है. दूसरों के बीच पहचान बनाने से आपकी इज्ज़त और खुशियों का दायरा बढ़ता है.

आज मैं पहचान बनाने की बात इसलिए भी कर रही हूँ क्योंकि एक फेसबुक फ्रेंड के पोस्ट ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने लेखक रोबिन शर्मा की एक किताब के बारे में कुछ अनमोल बातें लिखी थी, वैसे तो किताब का नाम- “Who Will Cry When You Die (आपकी मृत्यु पर कौन रोयेगा?)” ही काफी है काफी कुछ समझाने में लेकिन सरोज जी का वो कैप्शन- “सच है अपने लिए ही जिया तो क्या जिया वो तो सब जीते है..” मुझे हमेशा याद रहेगा.

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कभी-कभी दुःख होता है न ये जानकार की किसी को आपकी मौजूदगी- नामौजूदगी से फरक नहीं पड़ता? तो सोचो अगर आप ऐसे ही दुनिया में आ कर चले जाओगे तो आपको याद करने वाला कौन होगा? आपके लिए रोने वाला कौन होगा? जब तक आप अपने लिए कुछ नहीं करोगे तो आपको कोई क्यों याद करेगा? आपकी क्या पहचान रह जाएगी अगर हर कोई आपको नज़रंदाज़ करता जायेगा क्योंकि आपको किसी के साथ होने न होने से कोई फरक नहीं पड़ता?

सोशल मीडिया पर आपने ऐसा कुछ शायद कभी पढ़ा हो- “बस एक दिन के लिए मर कर देखना चाहता हूँ ताकि पता चले किसको मेरी याद आती है“. अगर आपके मन में भी कभी ये ख्याल आया हो या आता हो तो एक बार ये सोच कर देखिये की एक दिन मर के देखने की बजाये क्यों न एक दिन अपने तरीके से जी कर देख लिया जाए, ऐसे जैसे वो दिन ज़िन्दगी का आखरी दिन हो.

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इन्स्टाग्राम पर जब लोगों से ये सवाल करती हूँ की क्या करोगे जब पता चलेगा की आज आपका आखरी दिन है तो वो अपनी इच्छाएं बताते हैं लेकिन वो लोग ऐसा करने के लिए इंतज़ार क्यों करते हैं? अपनी खुशियों को इतना इंतज़ार करवाना तो खुद के साथ अन्याय है. सच तो ये है की मौत बता कर नहीं आती और मौत के समय ज्यादातर लोग अस्पताल के किसी कमरें में हाथ में ग्लूकोस लगवाए लेटे होते हैं. उस समय में ज़्यादातर लोग वो नहीं कर पाते जो वो अपने आखरी दिन करना चाहते हैं और परलोक सिधार जाते हैं.

दोस्तों, मुझे फरक नहीं पड़ता मेरे जाने पर कौन रोता है लेकिन मेरी वजह से कितनो को ख़ुशी मिलती है, उनको खुश देख कर मुझे कितनी ख़ुशी मिलती है, मेरे अपनों को मुझ पर कितना गर्व होता है इससे मुझे फरक पड़ता है. इसलिए मैं आपको भी यही करने का अनुरोध करती हूँ की मौके का इंतज़ार करने की बजाये मौके का स्वयं निर्माण कर वो करना शुरू करो जो आप करना चाहते हो, बनना चाहते हो.

मैं ये जानती हूँ की परिस्थिति हर बार हमारे हक़ में नहीं होती लेकिन जब भी होती है कम से कम तब हम दूसरों की मदद कर सकते हैं. दुसरो के लिए आवाज़ उठाना हर बार आसान नहीं होता लेकिन हम अपने भले के लिए तो आवाज़ उठा सकते हैं. हो सकता है आपके एक कदम से कई लोगों को प्रेरणा मिल सके अपने लिए आवाज़ उठाने की, कुछ बनने की, अपने लिए कुछ करने की. आप कई लोगों के लिए अच्छा उदाहरन तो बन सकते है न? इसके लिए आपको बस एक चीज़ करनी है और वो है खुद की भलाई की राह पर चलते हुए दुसरो के ख्वाबों को सहारा देना.

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6 thoughts on “अपनी पहचान बनाना क्यों ज़रूरी है?”

  1. Great…. impressive writing riya and thank you so much for letting me remember n reallize it once again.
    लोगो की मदद करना बहुत जरूरी है humanity के लिए। जिस गली मुहल्ले में हम रहते है उसके बाहर अगर मान लीजिए कोई चौकीदार है, प्रेश वाला है, आइसक्रीम वाला है, कोई रिक्सा चलाने वाला व्यक्ति है, बूढ़ा है आइसक्रीम बेचने वाला है, गरीब व्यक्ति है…कुछ मत कीजिए बस महीने में एक बार जाइए आइसक्रीम खाइए उसको बोलिए दो आइसक्रीम दीजिए वो बोलेगा आप तो अकेले हो पर आप बोलिए की पहले दो तो सही आप…एक खाइए और एक उसको दीजिए और कहिए एक आपके लिए है आप खाइए🤍
    इस आईसक्रीम के जो पाच दस रुपए की जो कीमत है ना उसे ज्यादा महंगा हार्मोन आपके अंदर रिलीज हो जाएगा..जो बहुत से मेडिसिन खाने के बाद कभी कभी होता है।। आपने उसकी हेल्प नहीं की बल्कि उसके हेल्प के बहाने अपनी हेल्प कर ली। दीवाली हो , होली हो कोई त्योहार हो …आपका त्योहार है , आपके आसपास जो थोड़े से वंचित परिवार है उनके लिए कुछ कर दीजिए , कुछ छोटा मोटा गिफ्ट दे दीजिए, कुछ उनको व्यतिगत हेल्प कर दीजिए ….. आप पाएंगे की उनके नज़रों में जो थैंक यू का भाव आएगा ना ……और समय आने पर आपके लिए वो क्या नहीं कुछ कर देंगे आपको अंदाजा नहीं है।

    1. सरोज जी बहुत बहुत शुक्रिया. आपका आईस-क्रीम वाला उदहारण सरहनीय है. आपकी इतनी अच्छी सोच का लाभ सबको मिलता रहे यही चाहत है. दुसरो की मदद कर के आप खुद की सबसे बड़ी मदद करते हैं, आपकी ये बात बहुत प्रेरणादायक है. इतना अच्छा उदहारण देने के लिए आपका फिर से शुक्रिया.

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